वर्तमान में पत्रकारिता का गिरता स्तर: एक चिंताजनक परिदृश्य

 

लेख विनय तिवारी

आज के दौर में पत्रकारिता, जिसे कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, अपने मूल उद्देश्यों से भटकती नजर आ रही है। निष्पक्षता, सत्यता और जनहित जैसे मूल सिद्धांत धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए हैं, और उनकी जगह सनसनीखेज खबरें, टीआरपी की अंधी दौड़ तथा पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग ने ले ली है। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता की साख को कमजोर कर रही है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है।
पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य समाज को सही, सटीक और निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना होता है, ताकि नागरिक जागरूक होकर अपने अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें। लेकिन वर्तमान में कई मीडिया संस्थान खबरों को तथ्यों के आधार पर नहीं, बल्कि अपने हितों और एजेंडों के अनुसार प्रस्तुत कर रहे हैं। इससे आम जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और मीडिया पर से भरोसा कम होता जा रहा है।
प्रदेश सरकार द्वारा समय-समय पर दिए गए दिशा-निर्देशों का उद्देश्य प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित को सुनिश्चित करना होता है। लेकिन जमीनी स्तर पर कई अधिकारी इन निर्देशों की अनदेखी करते नजर आते हैं। योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं हो पाता, शिकायतों का समाधान समय पर नहीं होता और आम जनता परेशान होती रहती है। ऐसे में मीडिया का दायित्व होता है कि वह इन खामियों को उजागर करे और प्रशासन को आईना दिखाए। दुर्भाग्यवश, कई बार यही मीडिया इस जिम्मेदारी से पीछे हटता दिखाई देता है।
पत्रकारों पर बढ़ते हमले और खतरों का मुद्दा भी बेहद गंभीर है। आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जहां सच दिखाने या भ्रष्टाचार उजागर करने पर पत्रकारों को धमकियां दी जाती हैं, उन पर हमले होते हैं या उन्हें दबाने की कोशिश की जाती है। लेकिन इन घटनाओं पर प्रशासन की प्रतिक्रिया अक्सर सिर्फ औपचारिक बयानबाजी तक सीमित रह जाती है। सुरक्षा के नाम पर केवल सांत्वना देना एक आम प्रवृत्ति बन चुकी है, जो अत्यंत चिंताजनक है।
जब पत्रकार खुद असुरक्षित महसूस करेंगे, तो वे स्वतंत्र और निर्भीक होकर अपनी जिम्मेदारियां कैसे निभा पाएंगे? यह सवाल आज हर जागरूक नागरिक के मन में उठ रहा है। पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर के सच्चाई को सामने ला सकें।
इसके साथ ही, कुछ अधिकारियों द्वारा माननीय उच्चाधिकारियों के आदेशों और दिशा-निर्देशों की अनदेखी करना भी एक गंभीर समस्या है। यह न केवल प्रशासनिक अनुशासन को कमजोर करता है, बल्कि पत्रकारों और आम जनता के प्रति असम्मान का भी संकेत देता है। जब अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करेंगे, तो व्यवस्था में सुधार की उम्मीद करना कठिन हो जाता है।
आज जरूरत है कि पत्रकारिता अपने मूल स्वरूप में लौटे—जहां सत्य सर्वोपरि हो, जनहित प्राथमिकता हो और निष्पक्षता उसकी पहचान हो। मीडिया संस्थानों को आत्ममंथन करना होगा और यह तय करना होगा कि वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह निभा सकते हैं। साथ ही, प्रशासन को भी अपनी भूमिका समझते हुए पत्रकारों को सुरक्षा, सम्मान और सहयोग प्रदान करना चाहिए।
अंततः, एक मजबूत लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और सुरक्षित पत्रकारिता का होना अनिवार्य है। यदि समय रहते इस गिरते स्तर को नहीं संभाला गया, तो इसका प्रभाव पूरे समाज और व्यवस्था पर पड़ेगा। इसलिए अब वक्त आ गया है कि सभी संबंधित पक्ष—मीडिया, प्रशासन और समाज—मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाएं, ताकि पत्रकारिता की गरिमा और विश्वसनीयता को फिर से स्थापित किया जा सके।

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