वर्दी की भी सुन लो आपबीती न त्यौहार, न कोई रमज़ान, न छुट्टी… बस ड्यूटी

 

विनय तिवारी की कलम से

उत्तर प्रदेश/गोरखपुर। देश की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर होती है, वो कंधे अक्सर अपनी ही थकान, भावनाओं और जरूरतों को दबा देते हैं। वर्दी सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन और कर्तव्य का प्रतीक होती है। लेकिन इस वर्दी के पीछे छिपी इंसानी कहानी को बहुत कम लोग समझ पाते हैं।
जब पूरा देश त्योहारों की खुशियों में डूबा होता है, घरों में दीये जलते हैं, सेवाईं पकती हैं, रंग और खुशबू से माहौल महकता है — उसी समय वर्दीधारी अपने परिवार से दूर, सड़कों पर, चौक-चौराहों पर, सीमाओं पर तैनात रहता है। उसके लिए न होली होती है, न दिवाली, न ईद और न ही रमज़ान की इबादत का सुकून। उसके हिस्से में बस “ड्यूटी” होती है।
एक पुलिसकर्मी, सैनिक या अन्य सुरक्षा बल का जवान जब वर्दी पहनता है, तो वह सिर्फ अपनी पहचान नहीं बदलता, बल्कि अपनी प्राथमिकताएं भी बदल देता है। परिवार की खुशियां, बच्चों की हंसी, माता-पिता का स्नेह — सब कुछ पीछे छूट जाता है। उसके लिए सबसे ऊपर होता है देश और समाज की सुरक्षा।
कई बार तो हालात ऐसे होते हैं कि लगातार घंटों, बल्कि दिनों तक ड्यूटी करनी पड़ती है। न समय पर खाना, न आराम, न नींद। फिर भी चेहरे पर सख्ती और दिल में जिम्मेदारी लिए वह अपने कर्तव्य को निभाता रहता है। आम नागरिक जब चैन की नींद सोता है, तो उसकी इस नींद के पीछे किसी वर्दीधारी की जागी हुई रात होती है।
वर्दी पहनना जितना गर्व की बात है, उतना ही कठिन भी है। इसमें त्याग है, संघर्ष है और बहुत सारी अनकही कहानियां हैं। जरूरत है कि हम इनकी मेहनत और समर्पण को समझें, सम्मान दें और इनके प्रति संवेदनशील बनें।

क्योंकि सच यही है —
हमारे त्योहारों की खुशियां, उनकी ड्यूटी की कुर्बानियों पर टिकी होती हैं।

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