बजरंग दल का विरोध,पुलिस अधीक्षक की तबादला एक्सप्रेस,निष्कर्ष क्या ? पूछती है जनता

 

रायबरेली। बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और सलोन थानाध्यक्ष के बीच चल रही खीच तान पर थानाध्यक्ष के स्थानांतरण के बाद समाप्त हो गया । लेकिन जैसा थानाध्यक्ष सलोन राघवन सिंह को अन्य थाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है । उससे कहीं भी यह नहीं लगता है कि यह स्थानांतरण बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और उनके नेताओं के विरोध के कारण हुआ है।जिन कार्यकार्यक्ताओं की मांगों के समर्थन में खुद राज्य मंत्री दिनेश सिंह और पूर्व कैबिनेट मंत्री भाजपा नेता मनोज कुमार पांडे कर चुके। उन्होंने मीडिया को दिए सवाल के जवाबों में खुद कहा है कि यह पुलिस ने कानूनन बजरंग दल के नेताओं के साथ गलत कार्य किया । लेकिन बजरंग दल के धरना प्रदर्शन के बाद जिस तरह पुलिस अधीक्षक ने तबादला एक्सप्रेस चलकर सलोन समेत कई थानाध्यक्षों का कार्य भार छीन कर दूसरी जगह का चार्ज सौंप दिया। इससे यह तो कही नहीं लगता है कि पुलिस अधीक्षक ने किसी भी प्रकार की सख्त कार्यवाही कर थानाध्यक्ष राघवन सिंह को दंडित किया। बल्कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने तीन दिन धरना प्रदर्शन कर आम जनमानस को भले ही अपने आक्रोश का रुतबा दिखा दिया। अब यही जनता पूछने लगी है कि आखिरकार 3 दिन तक चले धरना प्रदर्शन में क्या हासिल हुआ। थानाध्यक्ष सलोन जो एक जगह पर गलत कार्यों के कारण चर्चा में आए तो उनसे क्या उम्मीद की जाए कि जब दूसरे क्षेत्र का उन्हें थानाध्यक्ष बनाये जाने से वहां पर निष्पक्ष ईमानदार और स्वच्छ छवि से कार्य करेंगे । इसी को लेकर जनता में चर्चा बनी हुई है कि यह कार्यवाही पुलिस अधीक्षक ने बजरंग दल के आक्रोश को शांत करने के लिए किया या बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया कि हम कुछ भी नहीं करेंगे। इसके बदले छोटे पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही अवश्य हो गई जो संतुष्टि जनक बताई जा रही है। लेकिन थानाध्यक्षों पर हुई कार्यवाही पर जनता पुलिस अधीक्षक की इस कार्यवाही पर सवालिया निशान भी उठा रही है।पुलिसिया कार्यवाही को लेकर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के सड़क पर उतरते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया।लंबे धरना-प्रदर्शन के दबाव के आगे झुके एसपी को आखिरकार सलोन कोतवाल राघवन कुमार सिंह को हटाना पड़ा। उन्हें डलमऊ भेजा गया है । इस मामले में कार्रवाई इतनी देर से हुई कि सवाल उठने लगे । क्या पुलिस प्रशासन फैसले अपने विवेक से लेता है या फिर दबाव में? सलोन की करहिया चौकी से तबादले के नाम पर लालगंज भेजे गए दरोगा नितिन कुमार को अब लाइन हाजिर किया गया । यह कदम प्रशासन की कथित लीपापोती को उजागर करता है।जहां पहले मामला दबाने की कोशिश हुई और जब बात बिगड़ी तो आनन-फानन में कार्रवाई दिखानी पड़ी।पूरे घटनाक्रम ने कानून-व्यवस्था और पुलिस की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।अब देखना यह है कि यह कार्रवाई वास्तविक सुधार है या सिर्फ आंदोलन शांत कराने की रणनीति।यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि रायबरेली पुलिस दबाव में फैसले ले रही है,न कि कानून और न्याय के आधार पर।इस प्रकरण ने साबित कर दिया है कि जब तक संगठन सड़क पर नहीं उतरते,तब तक अफसरशाही सोती रहती है।सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई हुई या नहीं,सवाल यह है कि कार्रवाई कब और क्यों हुई? क्या बिना संगठन के आंदोलन के पुलिस अपने ही अफसरों पर कदम उठाने का साहस करती? या फिर प्रशासन अब केवल वही सुनता है,जिसकी आवाज सड़क पर सबसे तेज हो? इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया ।आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि प्रशासन अपनी स्वतंत्रता बचा पाता है या फिर हर अगला फैसला भी सड़क के इशारों पर तय होगा।

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