सरस्वती शिशु मंदिर रेलविहार (10+2) राप्तीनगर गोरखपुर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का भव्य आयोजन हुआ

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गोरखपुर जनपद के राप्तीनगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर रेलविहार (10+2) के प्रांगण में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के पावन अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम और योग शिविर का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में विद्यालयों के आचार्यों, दीदियों और प्रबुद्ध नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक रूप से दीप प्रज्वलन और वंदना के साथ हुआ, जिसके बाद योग के व्यावहारिक और आध्यात्मिक पक्षों पर गहन मंथन किया गया।

प्रधानाचार्य जी का आत्मीय परिचय एवं गीता के ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ पर विशेष उद्बोधन

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में विद्यालय के आदरणीय प्रधानाचार्य जी ने मंच को सुशोभित कर रहे सभी नवागत अतिथियों का आत्मीय परिचय कराया और अंगवस्त्र भेंट कर उनका गरिमामयी अभिनंदन किया। इसके पश्चात अपने ओजस्वी और विचारोत्तेजक उद्बोधन में प्रधानाचार्य जी ने भारतीय संस्कृति के मूल आधार श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक “योगः कर्मसु कौशलम्” (अर्थात कर्मों में कुशलता ही योग है) का अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया।

उन्होंने अपने उद्बोधन से प्रेरित करते हुए कहा कि योग केवल चटाई पर बैठकर आसन प्राणायाम करना नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना भी योग का ही एक रूप है। एक आचार्य का अपने शिक्षण कार्य के प्रति पूरी तरह समर्पित होना, बच्चों के भविष्य को संवारना और राष्ट्र निर्माण में अपनी प्रामाणिक भूमिका निभाना ही वास्तव में सच्ची ईश्वर आराधना और योग है। गीता का यह कालजयी दर्शन हमें सिखाता है कि बिना किसी स्वार्थ के, निष्काम भाव से कर्म करना ही जीवन को सफल बनाता है। उन्होंने सभी आचार्यों से आह्वान किया कि वे शिक्षा दान को केवल एक जीविकोपार्जन का साधन या दायित्व न मानकर अपनी साधना और योग बनाएं, जिससे समाज को ऊर्जावान, अनुशासित और सुसंस्कृत नागरिक मिल सकें।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में लोक निर्माण विभाग (PWD) के मुख्य अभियंता वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त मुख्य अतिथि हीरा लाल कुशवाहा जी का गरिमामयी आगमन हुआ, जिनका मंच पर कन्हैया जी द्वारा अंगवस्त्र पहनाकर विशेष सम्मान किया गया। इसी क्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे कृष्णा सिंह जी सेवानिवृत्त प्रवक्ता केंद्रीय विद्यालय का आदरपूर्वक सम्मान व्यवस्था प्रमुख रामपुजारी जी द्वारा किया गया।

अपने मुख्य संबोधन में श्री हीरा लाल कुशवाहा जी ने योग के प्राचीन इतिहास, इसकी उत्पत्ति और समकालीन जीवन में इसके असाधारण महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने ऋषियों की इस भूमि के गहरे रहस्यों को साझा करते हुए बताया कि हमारा यह मानव शरीर पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से निर्मित है और इसे स्वस्थ रखने का एकमात्र साधन योग है। उन्होंने एक बेहद अनूठा और आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि मस्तक पर लगाया जाने वाला सिंदूर वास्तव में माता और पिता के पवित्र जुड़ाव का दिव्य प्रतीक है। उन्होंने जैविक और आध्यात्मिक पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारे शरीर का दायां हिस्सा पिता का और बायां हिस्सा माता का प्रतिनिधित्व करता है, जो अर्धनारीश्वर के रूप को दर्शाता है। अंत में, उन्होंने संपूर्ण सभागार में उपस्थित सभी जनों के हृदय में बैठे हुए परमात्मा को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रणाम करके अपने इस ज्ञानवर्धक संबोधन को विराम दिया।

इसके पश्चात व्यावहारिक सत्र में सुश्री शैल जी और श्रीमान रवि श्रीवास्तव जी के कुशल निर्देशन में सामूहिक योगाभ्यास कार्यक्रम संपन्न हुआ। दोनों योग प्रशिक्षकों ने उपस्थित सभी आचार्यों, दीदियों और अतिथियों को ताड़ासन, वृक्षासन, भुजंगासन, सूर्य नमस्कार सहित अनुलोम-विलोम, कपालभाति और भ्रामरी प्राणायाम का विधिवत अभ्यास कराया। उन्होंने विभिन्न आसनों से शरीर को मिलने वाले लाभों और दैनिक जीवन में प्राणायाम की उपयोगिता को विस्तार से समझाया। संपूर्ण कार्यक्रम योगमय, अनुशासित और ऊर्जावान वातावरण में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का संचालन जयंती एवं मीडिया प्रमुख आचार्य प्रेम सागर त्रिपाठी द्वारा किया गया। इस अवसर पर समस्त आचार्य आचार्या एवं अभिभावकगण उपस्थित रहे ‌।

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