कलम खामोश हुई तो लोकतंत्र भी मौन हो जाएगा

सवाल पूछना अपराध नहीं, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है

गोरखपुर(विनय तिवारी की कलम से )। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन संविधान, कानून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्थायी मूल्य हैं। पत्रकार किसी सरकार का विरोधी नहीं होता, वह जनता की आँख, कान और आवाज़ होता है। इसलिए जब किसी पत्रकार पर हमला होता है, उसे कवरेज से रोका जाता है या उसके साथ अभद्र व्यवहार की शिकायत सामने आती है, तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी विषय बन जाता है।

लोकतंत्र की असली पहचान यह नहीं कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है, बल्कि यह है कि वह आलोचना और सवालों को कितनी सहजता से स्वीकार करती है। जब पत्रकार निर्भीक होकर सच सामने लाता है, तब वह किसी व्यक्ति या सरकार के विरुद्ध नहीं, बल्कि जनता के हित में अपना दायित्व निभा रहा होता है।
हाल के दिनों में पत्रकारों के साथ हुई विभिन्न घटनाओं ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। यदि किसी पत्रकार पर हमला होता है, समाचार कवरेज के दौरान अभद्रता की शिकायत आती है या रिपोर्टिंग में बाधा उत्पन्न की जाती है, तो ऐसे प्रत्येक मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच आवश्यक है। दोषी चाहे कोई भी हो, कानून का व्यवहार सभी के लिए समान होना चाहिए।
प्रदेश की कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए समय-समय पर शासन और पुलिस नेतृत्व द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन यदि जमीनी स्तर पर उन निर्देशों के अनुपालन पर सवाल उठते हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है कि संबंधित मामलों की निष्पक्ष समीक्षा हो और जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए प्रभावी कार्रवाई दिखाई भी दे।
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल कमियों को उजागर करना नहीं, बल्कि समाज और शासन के बीच भरोसे का पुल बनना भी है। विकास कार्यों की सराहना करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है जनता की पीड़ा, भ्रष्टाचार, अपराध और प्रशासनिक कमियों को सामने लाना। यही लोकतंत्र का स्वस्थ स्वरूप है।
यह भी उतना ही सत्य है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता तथ्य, संतुलन और नैतिकता पर आधारित होनी चाहिए। वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह समाचार संकलन कर रहे पत्रकारों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करे और यदि किसी घटना में पत्रकारों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर न्याय दिलाए।
लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है, और जनता का विश्वास सच से बनता है, डर से नहीं। इसलिए आवश्यकता टकराव की नहीं, संवाद की है; दबाव की नहीं, न्याय की है; और भय की नहीं, संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रताओं के सम्मान की है।
जब कलम सुरक्षित होगी, कैमरा निर्भीक होगा और सच कहने वालों को न्याय मिलेगा, तभी लोकतंत्र वास्तव में मजबूत होगा। क्योंकि इतिहास गवाह है—जहाँ सवालों की आवाज़ दबती है, वहाँ व्यवस्था कमजोर होती है; और जहाँ सच बोलने वालों को सम्मान मिलता है, वहीं लोकतंत्र सबसे अधिक सशक्त होकर आगे बढ़ता है।

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