अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान गोरखपुर में पहली बार दूरबीन पद्धति से पीयूजे अवरोध की जटिल शल्यक्रिया सफल

 

अवधेश पाण्डेय जिला संवाददाता गोरखपुर

गोरखपुर।अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान गोरखपुर में चिकित्सकों ने चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। यहां पहली बार दूरबीन पद्धति से पीयूजे अवरोध की जटिल शल्यक्रिया सफलतापूर्वक की गई है। इस उन्नत तकनीक के माध्यम से 46 वर्षीय महिला मरीज को लंबे समय से हो रही गुर्दे की गंभीर समस्या से राहत मिली है।
चिकित्सकों के अनुसार मूत्रवाहिनी-गुर्दा संगम अवरोध (पीयूजे अवरोध) वह स्थिति होती है,जिसमें गुर्दे के मूत्र संग्रहण भाग से मूत्रवाहिनी में मूत्र का प्रवाह आंशिक या पूर्ण रूप से रुक जाता है। इस कारण गुर्दे में सूजन उत्पन्न हो जाती है। यदि समय रहते इसका उपचार न किया जाए तो गुर्दे की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है और मरीज के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
पेट दर्द की शिकायत के बाद हुई जांच
46 वर्षीय महिला मरीज पेट में रुक-रुक कर होने वाले दर्द की शिकायत लेकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान गोरखपुर के सामान्य शल्य चिकित्सा विभाग में पहुंचीं। उनका परीक्षण विभाग के सह प्राध्यापक डॉ. धर्मेन्द्र कुमार पिपल की बाह्य रोगी सेवा में किया गया।
प्रारंभिक जांच के दौरान मरीज की संगणकीय टोमोग्राफी जांच कराई गई, जिसमें दाहिनी किडनी अत्यधिक फैली हुई पाई गई। यह स्थिति लंबे समय से गुर्दे में अवरोध होने का संकेत दे रही थी। इसके बाद विस्तृत जांच के लिए रेडियोन्यूक्लाइड गुर्दा परीक्षण कराया गया, जिसमें यह सामने आया कि दाहिनी किडनी की कार्यक्षमता केवल लगभग 20 प्रतिशत ही रह गई है।
इन सभी जांचों के आधार पर चिकित्सकों ने मरीज में पीयूजे अवरोध की पुष्टि की और उसके उपचार के लिए पाइलोप्लास्टी शल्यक्रिया करने का निर्णय लिया।

“शल्यक्रिया के दौरान सामने आई जटिल स्थिति”

शल्यक्रिया के दौरान चिकित्सकों ने पाया कि गुर्दे के निचले भाग को रक्त पहुंचाने वाली एक असामान्य रक्त वाहिका पीयूजे के ऊपर से गुजर रही थी। यही रक्त वाहिका उस स्थान पर दबाव बना रही थी, जिसके कारण मूत्र के प्रवाह में रुकावट उत्पन्न हो रही थी।
यह रक्त वाहिका गुर्दे के महत्वपूर्ण हिस्से को रक्त आपूर्ति कर रही थी, इसलिए इसे काटना संभव नहीं था। ऐसे में शल्य चिकित्सकों की टीम ने अत्यंत सावधानी से पीयूजे को काटकर उसे उस रक्त वाहिका के सामने पुनः जोड़ते हुए नया मार्ग बनाया, जिससे उस पर पड़ रहा दबाव समाप्त हो गया और मूत्र का प्रवाह सामान्य हो सका।
यह पूरी जटिल पुनर्निर्माण प्रक्रिया दूरबीन पद्धति के माध्यम से सफलतापूर्वक की गई। इस तकनीक के लिए उच्च स्तर की शल्य दक्षता, अनुभव और सूक्ष्म तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है।

“पारंपरिक शल्यक्रिया की तुलना में अधिक सुरक्षित”

चिकित्सकों ने बताया कि पहले इस प्रकार की शल्यक्रिया पसलियों के नीचे लंबा चीरा लगाकर की जाती थी, जिसे पारंपरिक खुली शल्यक्रिया कहा जाता है। इस पद्धति में मरीज को अधिक दर्द, घाव में संक्रमण, लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की आवश्यकता तथा कभी-कभी रक्त चढ़ाने जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता था।
इसके विपरीत दूरबीन पद्धति से की जाने वाली शल्यक्रिया में शरीर में छोटे-छोटे छिद्रों के माध्यम से ऑपरेशन किया जाता है। इससे मरीज को कम दर्द होता है, घाव संबंधी जटिलताएं कम होती हैं और अस्पताल में रहने की अवधि भी कम हो जाती है। साथ ही मरीज जल्दी सामान्य जीवन में लौट सकता है।

“चिकित्सकों की टीम ने किया सफल ऑपरेशन”

यह जटिल शल्यक्रिया सह प्राध्यापक डॉ. धर्मेन्द्र कुमार पिपल के नेतृत्व में संपन्न हुई। शल्य चिकित्सकों की टीम में वरिष्ठ आवासीय चिकित्सक डॉ. सलमान खान तथा कनिष्ठ आवासीय चिकित्सक डॉ. एलन फिलिप शामिल रहे। यह पूरा ऑपरेशन सामान्य शल्य चिकित्सा विभाग के अतिरिक्त प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. गौरव गुप्ता के मार्गदर्शन में किया गया।
बेहोशी चिकित्सा विभाग की टीम में डॉ. प्रियंका द्विवेदी, वरिष्ठ आवासीय चिकित्सक डॉ. प्रियंका तथा कनिष्ठ आवासीय चिकित्सक डॉ. उर्वशी शामिल रहीं, जिन्होंने पूरे ऑपरेशन के दौरान सुरक्षित बेहोशी प्रबंधन सुनिश्चित किया।
शल्यक्रिया के दौरान नर्सिंग सेवा में सुष्मिता और प्रीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनके सहयोग से पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो सकी।

“संस्थान की कार्यकारी निदेशक ने दी बधाई”

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर पूरी चिकित्सकीय टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि संस्थान आधुनिक और उन्नत चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है।
उन्होंने बताया कि दूरबीन पद्धति जैसी न्यूनतम आक्रामक तकनीकों के माध्यम से मरीजों को कम दर्द, कम जटिलताओं और शीघ्र स्वास्थ्य लाभ का लाभ मिलता है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार की जटिल शल्यक्रिया का सफलतापूर्वक संपादन संस्थान की बढ़ती विशेषज्ञता, सामूहिक कार्य और तकनीकी क्षमता को दर्शाता है। साथ ही संस्थान भविष्य में भी नई और उन्नत शल्य तकनीकों को अपनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा आसपास के क्षेत्रों के मरीजों को उच्च गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता रहेगा।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान गोरखपुर में पीयूजे अवरोध के लिए पहली बार दूरबीन पद्धति से पाइलोप्लास्टी शल्यक्रिया का सफलतापूर्वक किया जाना संस्थान में उन्नत और न्यूनतम आक्रामक शल्य चिकित्सा सेवाओं के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

4
3
1
5
6
7
2

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *