अमेरिका की नजर नेपाल के यूरेनियम भंडार पर है

 

उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
19/04/2026

काठमाण्डौ,नेपाल – क्या नेपाल अपना कीमती यूरेनियम भंडार अमेरिका को सौंपने जा रहा है? अमेरिकी विदेश मंत्री समीर पॉल कपूर की औचक ‘केवल-नेपाल’ यात्रा ने इस रणनीतिक हलचल को दुनिया के ध्यान में ला दिया है।

*आइए इस पूरे भू-राजनीतिक खेल को समझें:*

*स्थान और खजाना:* ‘अपर मुस्तांग’
नेपाल के खान और भूविज्ञान विभाग ने 2014 के आसपास लो मंथांग (मुस्तांग) में एक बड़ी यूरेनियम खदान (लगभग 10 किमी लंबी और 3 किमी चौड़ी) की पुष्टि की।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, यहां का यूरेनियम ‘मध्यम श्रेणी’ का है, जो ऊर्जा और वैश्विक रणनीतिक उद्देश्यों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

‘मुस्तांग स्पेशल जोन’ और ‘पैक्स सिलिका’
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लो मुतांग के 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को “मुस्तांग स्पेशल जोन (MSZ)” घोषित करने की गुप्त तैयारी चल रही है।

*उद्देश्य:* “पैक्स सिलिका” गठबंधन के तहत अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को यूरेनियम प्रसंस्करण का विशेष अधिकार देना।

*सुरक्षा:* इसे ‘उच्च सुरक्षा अनुसंधान क्षेत्र’ के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां केवल नेपाली सेना और ऑस्ट्रेलियाई-अमेरिकी तकनीकी टीम को ही प्रवेश की अनुमति होगी।

* *एमसीसी प्रोजेक्ट का छिपा एजेंडा?*

साल 2017 में नेपाल और अमेरिका के बीच ‘एमसीसी प्रोजेक्ट’ को लेकर नेपाल में भारी विरोध हुआ था।

अब यह दावा किया जा रहा है कि इस परियोजना के तहत निर्मित बुनियादी ढांचे और बिजली आपूर्ति का उपयोग मुस्तांग में यूरेनियम प्रसंस्करण और नए एआई डेटा केंद्रों को बिजली देने के लिए किया जाएगा।

*चीन की धड़कनें इतनी तेज़ क्यों हैं?*

इस पूरी डील का सबसे संवेदनशील पहलू इसकी लोकेशन है। यह यूरेनियम खदान नेपाल-चीन सीमा से मात्र 10 किलोमीटर दूर है!

अमेरिका ने ‘दुर्लभ पृथ्वी’ खनिजों पर चीन के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए यह दांव खेला है। सीमा के इतने करीब किसी तीसरे देश (अमेरिका) की मौजूदगी से चीन और भारत दोनों की रणनीतिक चिंताएं बढ़ना तय है।

*सरकार ने क्या पुष्टि की है?*

नेपाल की पूर्व पीएम सुशीला कार्की और तत्कालीन वित्त मंत्री रामेश्वर खनाल ने ऐसे किसी भी समझौते से साफ इनकार किया है।

हालाँकि, कुछ लीक हुए गोपनीय दस्तावेज़ों का दावा है कि मार्च 2026 में चुनावों के ठीक बाद, सैद्धांतिक रूप से ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल होने और ‘डिजिटल हैश’ सुरक्षित करने पर सहमति दी गई है।

नेपाल सरकार के पास फिलहाल यूरेनियम निकालने की न तो तकनीक है, न पैसा और न ही बुनियादी ढांचा।

विदेशी मदद लेना उसकी मजबूरी है, लेकिन क्या अमेरिका भी हिमालय की इन वादियों में है?
क्या यह कोई नया भूकंप लाएगा?

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