भारत के लिए बड़ी राहत! अंडमान सागर में बड़े गैस भंडार की खोज से देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और तेल और गैस आयात पर निर्भरता कम होगी

उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
06/06/2026

काठमाण्डौ,नेपाल – भारत की नवरत्न कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) को अंडमान सागर के गहरे पानी में प्राकृतिक गैस खोजने में बड़ी सफलता मिली है।

केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस महत्वपूर्ण खोज की आधिकारिक पुष्टि की है।

इस खोज से संबंधित मुख्य तथ्य और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर इसका प्रभाव नीचे दिया गया है।

खोज से संबंधित मुख्य बिंदु:

यह खोज अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक खोजपूर्ण कुएं में ‘श्री विजयपुरम -3’ (श्री विजयपुरम -3) की खोज की गई है।

समुद्र की गहराई:

प्राकृतिक गैस का यह भंडार समुद्र में पानी के नीचे लगभग 355 मीटर की गहराई पर और इओसीन संरचना में 1,900 मीटर से अधिक की गहराई पर पाया जाता है।

गैस की पुष्टि:

प्रारंभिक उत्पादन परीक्षणों के दौरान गैस के लगातार भड़कने से हाइड्रोकार्बन की उपस्थिति की पुष्टि हुई है।

एक और बड़ी सफलता:

इस अभियान में ऑयल इंडिया द्वारा तीन कुएं खोदे गए। इनमें से दो में गैस पाई गई है (इससे पहले ‘श्री विजयपुरम-2’ में भी 87% मीथेन युक्त उच्च गुणवत्ता वाली गैस पाई गई थी)।

इस मिशन का उद्देश्य भारत के समुद्री इलाकों में छिपे तेल और गैस के विशाल भंडार का पता लगाना है।

भूवैज्ञानिकों का मानना ​​है कि अंडमान बेसिन की संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस समृद्ध क्षेत्रों के समान है, जिससे यहां और भी बड़े भंडार मिलने की प्रबल संभावना है।

भारत के लिए इसका मतलब (फायदा) यह है कि वह आयात पर कम निर्भर होगा:

भारत अपनी प्राकृतिक गैस का लगभग 50% और अपने कच्चे तेल का 85% से अधिक विदेशों से आयात करता है।

घरेलू उत्पादन बढ़ाने से यह निर्भरता काफी कम हो जायेगी।

वित्तीय बचत:

विदेशों से ईंधन न खरीदने से देश का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा, जिसका उपयोग देश की अन्य विकास गतिविधियों में किया जा सकता है।

व्यावसायिक उत्पादन में चुनौतियाँ हालाँकि यह एक बहुत बड़ी और सकारात्मक खबर है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, गहरे समुद्र से गैस निकालना (डीप-सी एक्सप्लोरेशन) तकनीकी रूप से बहुत जटिल और महंगा काम है।

आने वाले महीनों में इस गैस पूल के कुल आकार और इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता (कमर्शियल वायबिलिटी) की जांच की जाएगी। उसके बाद बड़े पैमाने पर गैस निकालने और उसे मुख्य भूमि तक पहुंचाने के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने में कुछ साल लग सकते हैं।

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