खुद के कर्मों का लेखा-जोखा भी जरूरी

 

पत्रकार विनय तिवारी की कलम से

मनुष्य का स्वभाव बड़ा विचित्र है। जब जीवन में सब कुछ अच्छा होता है तो वह अपनी सफलता का श्रेय स्वयं को देता है, लेकिन जब परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं तो दोष भगवान और भाग्य पर मढ़ने लगता है। अपने कर्मों को बिगाड़कर ईश्वर को दोष देना और फिर यह कहना कि “मैं तो तेरे भरोसे हूँ राधे” — यह आस्था नहीं, बल्कि आत्ममंथन से बचने का एक आसान रास्ता है।
सत्य यह है कि भगवान ने मनुष्य को विवेक, बुद्धि और कर्म करने की क्षमता प्रदान की है। यदि हम अपने निर्णय गलत लेते हैं, स्वार्थ, क्रोध, लोभ और अहंकार के वशीभूत होकर कार्य करते हैं, तो उसके परिणाम भी हमें ही भुगतने पड़ते हैं। ऐसे में ईश्वर को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।
भगवान की शरण में जाना केवल मंदिरों में माथा टेकने या जप-तप करने तक सीमित नहीं है। सच्ची भक्ति तब है जब व्यक्ति अपने भीतर झाँककर अपनी कमियों को पहचानने का साहस करे। जब वह अपने दोषों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का प्रयास करे, तभी ईश्वर की कृपा का वास्तविक अनुभव होता है।
छल, कपट, अहंकार और द्वेष मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। ये न केवल व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति को रोकते हैं, बल्कि उसके सामाजिक और पारिवारिक जीवन को भी प्रभावित करते हैं। इसके विपरीत विनम्रता, सत्य, करुणा और सदाचार ऐसे गुण हैं जो मनुष्य को महानता की ओर ले जाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दूसरों की गलतियाँ खोजने से पहले स्वयं का मूल्यांकन करें। अपने कर्मों को सुधारें, अपने विचारों को शुद्ध करें और ईश्वर पर विश्वास के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी ईमानदारी से पालन करें। जब मन निर्मल होगा और कर्म श्रेष्ठ होंगे, तब भगवान की शरण भी सार्थक होगी और जीवन में सुख, शांति तथा सफलता का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
“ईश्वर पर भरोसा रखें, लेकिन अपने कर्मों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करें। क्योंकि भगवान राह दिखाते हैं, चलना मनुष्य को स्वयं पड़ता है।”

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