खामेनेई के लिए लाखों ईरानियों को रोते देख ट्रंप ‘स्तब्ध’ हो गए

उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
06/07/2026

काठमाण्डौ,नेपाल – अंतरराष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में किसी भी देश के वास्तविक चरित्र को समझने की बजाय अपने हितों के अनुरूप ‘टिप्पणी’ रचने की प्रवृत्ति वाशिंगटन की पुरानी बीमारी है।

इसका एक बदसूरत उदाहरण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का हाल ही में ईरान के नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में लोगों की भीड़ देखकर आश्चर्यचकित होना और आंसू बहाना है।

अमेरिकी धारणा यह थी कि ‘ईरानी लोग खमेनेई से नफरत करते हैं’ खमेनेई की विदाई में शामिल हुए हजारों लोगों ने इसे खारिज कर दिया।

इस घटना ने एक कड़वे सच को उजागर कर दिया है, किसी भी देश को सिर्फ किसी राजनीतिक नारे या बाहरी नजरिए के चश्मे से देखना बहुत बड़ी मूर्खता है।

दरअसल, ईरान कोई एक अवधारणा या राजनीतिक नारा नहीं है। वहां के नागरिकों की भावनाएं अलग-अलग हैं।

कुछ ख़मेनेई के कट्टर समर्थक थे, जबकि अन्य आलोचक थे। कुछ के लिए वह धार्मिक आदर्श थे तो कुछ के लिए राष्ट्रीय प्रतिरोध के प्रतीक।

जब वाशिंगटन जैसे सत्ता केंद्र हजारों मील दूर बैठकर दूसरे देश के समाज की व्याख्या केवल ‘कार्टून’ या ‘स्क्रिप्ट’ के रूप में करते हैं, तो वे वास्तविकता से अलग हो जाते हैं।

खामेनेई के अंतिम संस्कार में निकले आंसू सिर्फ एक नेता को श्रद्धांजलि नहीं थे, वे ईरान के स्वायत्त सामाजिक अस्तित्व का प्रमाण थे।

इस संदर्भ का एक और गंभीर पहलू परमाणु हथियारों और सुरक्षा पर वैश्विक बहस है।

आज विश्व मंच पर ‘परमाणु हथियारों के लिए कौन सा देश सुरक्षित है?’

सवाल उठता है तो इजराइल को ‘जिम्मेदार’ और ईरान को ‘खतरनाक’ बताने वाली जो टिप्पणी स्थापित की गई है, वह सरासर दोहरे मापदंडों पर आधारित है।

क्या इजराइल का लगातार दण्डमुक्त होना और अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना करना ‘जिम्मेदार’ व्यवहार है?

एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में इसे ‘सुरक्षित विकल्प’ मानने और ईरान को लगातार ‘वैश्विक खतरा’ करार देने के लिए इजरायल की लाल रेखा के पार सैन्य आक्रामकता, कब्ज़ा और बमबारी जारी रखना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बनी गहरी पक्षपातपूर्ण खाई को दर्शाता है।

यदि परमाणु निरस्त्रीकरण वास्तव में दुनिया का सामान्य लक्ष्य है, तो ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ के इस कृत्रिम वर्गीकरण को रोका जाना चाहिए।

अंततः, किसी भी देश की आंतरिक जटिलताओं को समझे बिना सतही टिप्पणियाँ और भू-राजनीतिक मुद्दों पर दोहरे मानदंड दुनिया को और अधिक असुरक्षित बनाते हैं।

दुनिया को अब इजरायल को स्वत: ‘जिम्मेदार’ ठहराने और दूसरों को ‘आतंकवादी’ करार देने का अपना दिखावा बंद करना चाहिए।

वास्तविक सुरक्षा नीतियां केवल निष्पक्षता और समानता से निर्देशित हो सकती हैं, पूर्वाग्रह से नहीं।

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