अधिवक्ताओ का दमन करना चाहती है सरकार = रज्जू खान

रायबरेली। समाजवादी पार्टी अल्पसंख्यक सभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आफताब अहमद रज्जू खान एडवोकेट ने कहा कि अधिवक्ता विरोधी कानून माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा लागू किया जा रहा है जो पूरी तरह अधिवक्ता विरोधी कानून है। देश की आजादी में महात्मा गाँधी, डा0 राजेन्द्र प्रसाद, पंडित मोती लाल नेहरू, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल आदि अधिवक्ताओं ने न्यायालय से लेकर सड़क तक संघर्ष किया। इन पर मुकदमे लिखे गये और जेल गये। ब्रिटिश हुकूमत ने अधिवक्ताओं पर मुकदमें पंजीकृत होने के बावजूद उनकी प्रैक्टिस पर रोक नहीं लगायी। आज आजाद हिन्दुस्तान में अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने, सरकार की नीतियों से अहमति जताने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए अधिवक्ताओं पर झूठे मुकदमें दर्ज कर उन्हें प्रैक्टिस करने से रोके जाने का प्रयास किया जा रहा है, यही नहीं इस तुगलकी फरमान में स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी अधिवक्ता के विरूद्ध कोई अपराधिक मुकदमा पंजीकृत हुआ तो मुकदमें की समाप्ति तक उसकी सी.ओ.पी. सस्पेन्ड कर दी जाएगी और मुकदमे का ट्रायल अधिवक्ता के जनपद में न होकर किसी अन्य जनपद होगा। सरकार वकीलों का दमन करने पर उतारू है। सरकार व कोर्ट के इस निर्णय से पुलसिया राज मजबूत होगा। श्री खान ने कहा देश की सबसे बड़ी पंचायत लोक सभा में ए.डी.आर. की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार 225 सांसदों पर अपराधिक मुकदमें पंजीकृत है, जिसमें से 29ः, सांसदों पर हत्या, बलात्कार, बलात्कार का प्रयास, साम्प्रदायिक उन्माद, हत्या का प्रयास एवं अपहरण आदि के मुकदमें विचाराधीन है। ए.डी.आर. की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य सभा के 69 सांसदों के विरूद्ध अपराधिक मुकदमें पंजीकृत है। 36ः सांसदों के विरूद्ध हत्या, बलात्कार, हत्या का प्रयास, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, अपहरण व साम्प्रदायिक उन्माद आदि के मुकदमें विचाराधीन है। विधान सभा उ0प्र0 में ए.डी.आर. की रिपोर्ट 2022 के अनुसार 205 विधायकों के विरूद्ध अपराधिक मुकदमें पंजीकृत हैं, जिसमें से 36ः के विरूद्ध हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण आदि जैसे गम्भीर मुकदमें विचाराधीन है। विधान परिषद उ0प्र0 में 81 एम.एल.सी पर अपराधिक मुकदमें पंजीकृत है, जिनमें हत्या, बलात्कार, हत्या के प्रयास के मुकदमें विचाराधीन है। इन्हीं सांसद व विधायकों में से अधिकांश मंत्रिमंडल के सदस्य है, जिनके कंधों पर कानून बनाने की जिम्मेदारी है। सत्ता पक्ष के अपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद, विधायक व मंत्रियों ने अपने कई मुकदमें या तो वापस ले लिये हैं या वापस लेने की प्रक्रिया में है। कोर्ट द्वारा अधिवक्ताओं को आन्दोलन करने व कार्य से विरत रहकर अपनी समस्याओं के ध्यानाकर्षण के लिए किए जाने वाले प्रयासों को दबाने के लिए बार एसोसिएशन से एैसा न करने के लिए अन्डर टेकिंग मांगा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि न्यायालयों में सब कुछ ठीक-ठीक नहीं चल रहा है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण मान्नीय सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्तियों द्वारा की गयी प्रेस वार्ता है। तमाम न्यायमूर्ति के फैसले इस कारण भी निष्पक्ष नहीं हो पाते हैं, क्योंकि उनकी सोच में सेवानिवृत्त होने के बाद लाभ का पद पाने की लालसा होती है। अधिवक्ता अपने हक़ के लिए आन्दोलन से पीछे नहीं हटेंगे।

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