लद्दाख का नया नक्शा विवाद: भारत-चीन आमने-सामने

उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
15/10/2026

काठमाण्डौ,नेपाल – भारत और चीन के बीच लद्दाख के सीमा क्षेत्र को लेकर लंबे समय से चला आ रहा भूराजनीतिक और कूटनीतिक विवाद एक बार फिर भड़क गया है।

भारत सरकार द्वारा केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में 28 भौगोलिक स्थानों के आधिकारिक और मानक नामों की घोषणा के बाद चीन ने इस पर आपत्ति जताई है।

चीन ने भारत के कदम को अवैध और अमान्य बताते हुए साफ कर दिया है कि उसने कभी भी तथाकथित केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को मान्यता नहीं दी है।

दूसरी ओर, भारत ने चीन के इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया और अपना रुख दोहराया कि लद्दाख भारत का अभिन्न अंग है और चीनी आपत्तियों के बावजूद इस स्थापित तथ्य को बदला नहीं जा सकता है।

दोनों पड़ोसी देशों के बीच मानचित्रों और नामकरण को लेकर इस ताजा विवाद ने द्विपक्षीय संबंधों में एक नई लहर पैदा कर दी है, जिसे 2020 के सैन्य संघर्ष के बाद से सुधारने की कोशिश की जा रही है।

विवाद की ताज़ा वजह

विवाद की तात्कालिक पृष्ठभूमि में भारत सरकार के गृह मंत्रालय और भारतीय सर्वेक्षण विभाग का ताजा कदम है।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने लद्दाख प्रशासन और स्थानीय हितधारकों के साथ परामर्श के बाद 2 अक्टूबर को आधिकारिक घोषणा की।

घोषणा के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के भीतर 28 महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थानों के नाम भारत के आधिकारिक सर्वेक्षण मानचित्र पर मानक नामों के रूप में पंजीकृत और पहचाने गए।

गृह मंत्रालय के अनुसार, इन 28 भौगोलिक स्थानों में 10 चोटियाँ, 3 पर्वत, 7 भूभाग, 2 घाटियाँ (दर्रे), 2 ग्लेशियर, एक घाटी, एक नदी, एक झील और एक अन्य जलाशय (जल निकाय) हैं। इन नामित स्थानों में भारत-चीन सीमा के पास गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स जैसे रणनीतिक स्थल भी शामिल हैं।

भारत के गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य इन भौगोलिक स्थानों की सही पहचान सुनिश्चित करना और आम जनता और एजेंसियों के बीच इसके बारे में स्पष्ट जागरूकता बढ़ाना है।

हालाँकि, भारत की घोषणा के कुछ ही दिनों के भीतर चीन ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।

चीन की आपत्ति और चीनी विदेश मंत्रालय का बयान

मंगलवार, 13 अक्टूबर को आयोजित एक नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने भारत के नामकरण निर्णय पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए प्रवक्ता निंग ने कहा कि सीमा का पश्चिमी हिस्सा चीन का संप्रभु क्षेत्र है।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा, “चीन ने भारत द्वारा एकतरफा और अवैध रूप से स्थापित तथाकथित केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को कभी मान्यता नहीं दी है और भारत द्वारा घोषित तथाकथित मानक नामों का कड़ा विरोध करता है।”

चीनी प्रवक्ता ने आगे कहा कि भारत का कदम बिना कानूनी आधार के है।

माओ निंग ने कहा, “भारत का कदम अवैध और अमान्य है, और यह इस वस्तुगत तथ्य को नहीं बदल सकता कि चीन-भारत सीमा का पश्चिमी क्षेत्र हमेशा चीन का रहा है।”

चीन ने भारत की नामकरण प्रक्रिया को उसके क्षेत्रीय दावों पर अतिक्रमण के रूप में व्याख्या की है, यह तर्क देते हुए कि भारत एकतरफा मानचित्रण या नाम बदलने से सीमा विवाद की यथास्थिति को नहीं बदल सकता है।

भारत की कड़ी प्रतिक्रिया

चीन की प्रतिक्रिया के कुछ ही घंटों के भीतर भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़े शब्दों में जवाब देते हुए चीनी दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए साफ कर दिया कि लद्दाख की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने साफ कहा, ”यह दोहराया जाता है कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है. चीनी पक्ष चाहे कितना भी इनकार कर ले, इस स्थापित तथ्य को बदला नहीं जा सकता।”

प्रवक्ता जयसवाल ने गृह मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति का हवाला देते हुए आगे कहा, ‘जहां तक भारत सरकार के गृह मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति का सवाल है, यह स्वतः स्पष्ट है।

घोषणा में, यह उल्लेख किया गया है कि लद्दाख प्रशासन और स्थानीय हितधारकों के परामर्श से सर्वेक्षण विभाग के आधिकारिक मानचित्र पर मानक नामों के साथ केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में 28 स्थानों/विशेषताओं की पहचान की गई है।

चीनले लद्दाखको नामकरणमा देखाएको पछिल्लो आक्रोशको पृष्ठभूमि सन् २०१९ को भारतीय प्रशासनिक निर्णयसँग जोडिएको छ।

५ अगस्ट २०१९ मा भारत सरकारले संविधानको धारा ३७० खारेज गर्दै तत्कालीन जम्मु–कश्मीर राज्यको विशेष संवैधानिक दर्जा अन्त्य गरेको थियो।

त्यसको भोलिपल्ट अर्थात् ६ अगस्टमा भारतले जम्मु–कश्मीरलाई विभाजन गरी ‘जम्मु–कश्मीर’ र ‘लद्दाख’ गरी दुईवटा छुट्टाछुट्टै केन्द्रशासित प्रदेश (युनियन टेरिटोरी) बनाउने घोषणा गर्‍यो।

भारतको यो निर्णयप्रति चीनले सुरुदेखि नै कडा आपत्ति जनाउँदै आएको छ। ६ अगस्ट २०१९ मा चिनियाँ विदेश मन्त्रालयकी तत्कालीन प्रवक्ता हुआ चुनयिङले प्रतिक्रिया दिँदै सीमाको पश्चिमी क्षेत्रमा रहेको चिनियाँ भूभागलाई भारतले आफ्नो प्रशासनिक क्षेत्रभित्र समेटेर लद्दाखलाई छुट्टै केन्द्रशासित प्रदेश बनाएकोमा विरोध जनाएकी थिइन्।

उनले भारतको सो कदमलाई ‘अस्वीकार्य’ भनेकी थिइन्। त्यसको जवाफमा भारतले पुनर्गठन आफ्नो पूर्ण रूपमा आन्तरिक मामिला भएको बताएको थियो।

अक्टोबर २०१९ मा जब यी दुवै केन्द्रशासित प्रदेशहरू औपचारिक रूपमा अस्तित्वमा आए, तब चीनका अर्का प्रवक्ता गेंग सुवाङले पुनः आपत्ति दोहोर्‍याएका थिए।

प्रवक्ता गेंग सुवाङले भनेका थिए, ‘जम्मु–कश्मीर र लद्दाखलाई तथाकथित केन्द्रशासित प्रदेश बनाउने भारतको कदमले चिनियाँ भूभागको केही भागलाई भारतीय प्रशासनअन्तर्गत राखेको छ।

यो कदम अवैध, शून्य र अमान्य छ र यसले वास्तविकतालाई परिवर्तन गर्न सक्दैन।’

त्यतिबेला भारतीय परराष्ट्र मन्त्रालयका तत्कालीन प्रवक्ताले भारत अन्य देशको आन्तरिक मामिलामा टिप्पणी नगर्ने भएकाले चीनलगायत अन्य देशले पनि भारतको आन्तरिक निर्णयमा टिप्पणी गर्ने अपेक्षा नगरिएको कडा जवाफ दिएका थिए।

यति मात्र होइन, पाकिस्तानको अनुरोधमा चीनले सन् २०१९ मा जम्मु–कश्मीर र लद्दाखको विषयलाई लिएर संयुक्त राष्ट्रसङ्घीय सुरक्षा परिषद्को बन्दकोठा बैठकमा समेत यो मुद्दा उठाएको थियो।

तर संयुक्त राष्ट्रसङ्घ सुरक्षा परिषद्का अन्य स्थायी सदस्यहरू अमेरिका, फ्रान्स, बेलायत र रुसले चिनियाँ प्रस्तावमा कुनै रुचि देखाएनन्। चीनले त्यहाँबाट कुनै समर्थन पाउन सकेन।

पछि डिसेम्बर २०२३ मा भारतको सर्वोच्च अदालतले धारा ३७० खारेज गर्ने सरकारको निर्णयलाई संवैधानिक रूपमा सही ठहर्‍याउँदै फैसला सुनाएपछि पनि चीनले पुनः विरोध जनाएको थियो।

१३ डिसेम्बर २०२३ मा प्रवक्ता माओ निङले अदालतको फैसलाले सीमाको पश्चिमी क्षेत्र सधैँ चीनकै रहेको भन्ने तथ्यलाई बदल्न नसक्ने र चीनले लद्दाखलाई केन्द्रशासित प्रदेशको रूपमा कहिल्यै मान्यता नदिने बताएकी थिइन्।

सन् २०२० को सैन्य मुठभेड र कूटनीतिक उतारचढाव

भारत र चीनबीचको यो सीमा विवाद कागजी र नक्सामा मात्र सीमित छैन। यसले दुई देशलाई युद्धको सँघारमा समेत पुर्‍याएको छ।

सन् २०२० जुन १५ बाट पूर्वी लद्दाखको गलवान उपत्यकालगायतका क्षेत्रमा भारत र चीनका सैनिकबीच हिंसात्मक झडप भएको थियो।

उक्त झडपमा दुवै पक्षका सैनिकको ज्यान गएको थियो, जसका कारण दुई देशबीचको राजनीतिक र कूटनीतिक सम्बन्ध इतिहासकै सबैभन्दा तल्लो विन्दुमा पुगेको थियो।

पूर्वी लद्दाखको सीमा रेखामा लामो समयसम्म सैन्य तनाव कायम रहेपछि दुवै देशले सैन्य र कूटनीतिक तहमा दर्जनौँपटक वार्ता गरे।

अन्ततः अक्टोबर २०२४ मा भारत र चीनबीच वास्तविक नियन्त्रण रेखा (एलएसी) का विवादित बिन्दुहरूबाट सेना पछाडि हटाउने सम्झौता भयो।

यो सम्झौतापछि दुवै देशबीच चिसिएको सम्बन्धलाई पुनः सामान्यीकरणतर्फ लैजाने ढोका खुलेको थियो।

सम्बन्ध सुधारका लागि दुवै देशले विश्वास वृद्धि गर्ने विभिन्न उपाय अपनाउन थालेका थिए।

यसै क्रममा दुई देशबीच रोकिएका प्रत्यक्ष हवाई सेवा पुनः सञ्चालन गर्ने सहमति भएको थियो।

भारतले चिनियाँ नागरिकका लागि पर्यटक भिसा जारी गर्ने प्रक्रिया पुनः सुरु गरेको थियो।

हिन्दू धर्मावलम्बीको पवित्र तीर्थस्थल कैलाश मानसरोवर यात्रा पनि पुनः सञ्चालनमा ल्याइएको थियो।

कूटनीतिक प्रयासहरू

दुई देशबीचको राजनीतिक संवादलाई माथिल्लो तहबाटै अघि बढाउन दुवै देशका प्रमुखले उच्चस्तरीय बैठकहरू गरेका छन्।

सन् २०२४ मा रुसको कजान सहरमा आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलनका क्रममा भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी र चिनियाँ राष्ट्रपति सी जिनपिङबीच महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता भएको थियो।

सो बैठकमा दुवै नेताले आफ्ना सरकारहरूलाई सीमामा शान्ति कायम गर्दै द्विपक्षीय सम्बन्ध सामान्यीकरणको प्रक्रिया सुरु गर्न निर्देशन दिएका थिए।

त्यसपछि कूटनीतिक आदानप्रदानले थप गति लियो। सन् २०२५ मा भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी साङ्घाई सहयोग सङ्गठन (एससीओ) राष्ट्रप्रमुखहरूको शिखर सम्मेलनमा भाग लिन चीनको तियान्जिन सहर पुगेका थिए।

त्यसैगरी चिनियाँ राष्ट्रपति सी जिनपिङ पनि भर्खरै सम्पन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलनका लागि भारतको राजधानी नयाँदिल्ली आएका थिए। सात वर्षको लामो अन्तरालपछि राष्ट्रपति सीको यो पहिलो भारत भ्रमण थियो।

शिखर सम्मेलनका क्रममा प्रधानमन्त्री मोदी र राष्ट्रपति सी दुवैले अघिल्लो भेटघाटयता द्विपक्षीय सम्बन्धले स्थिर प्रगति गरेको स्वीकार गरेका थिए।

सो अवसरमा भारतीय प्रधानमन्त्री मोदीले सीमा क्षेत्रमा शान्ति र स्थिरता कायम राख्नु नै दुई देशको सम्बन्धलाई थप अघि बढाउनका लागि अनिवार्य पूर्वसर्त भएको कुरामा विशेष जोड दिएका थिए।

सीमा विवादको समाधान खोज्न सन् २०२५ को १९ अगस्टमा अजित डोभाल र वाङ यीबीच नयाँदिल्लीमा २४औँ चरणको विशेष प्रतिनिधि वार्ता भएको थियो, जसमा उपयुक्त क्षेत्रहरूमा सीमाङ्कनको ‘अर्ली हार्भेस्ट’ अन्वेषण गर्न र भारत–चीन सीमा मामिला परामर्श र समन्वय संयन्त्र (डब्ल्यूएमसीसी) अन्तर्गत विज्ञ समूह गठन गर्न सहमति भयो।

यसलाई २५ अगस्ट २०२६ मा बेइजिङमा भएको २५औँ चरणको वार्ताले अगाडि बढायो, जहाँ सीमाङ्कन र सीमा व्यवस्थापनका लागि ‘अर्ली एन्ड सब्स्ट्यान्सियल हार्भेस्ट’ मा प्रगति गर्ने आठबुँदे सहमति भएको थियो।

लद्दाख के नामकरण पर चीन की हालिया नाराजगी की पृष्ठभूमि 2019 के भारतीय प्रशासनिक फैसले से जुड़ी है।

5 अगस्त 2019 को, भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया और तत्कालीन राज्य जम्मू और कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति को समाप्त कर दिया।

अगले दिन, 6 अगस्त को, भारत ने जम्मू और कश्मीर को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करने की घोषणा की।

चीन शुरू से ही भारत के इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जता रहा है. 6 अगस्त, 2019 को चीनी विदेश मंत्रालय की तत्कालीन प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने भारत द्वारा सीमा के पश्चिमी क्षेत्र में चीनी क्षेत्र को अपने प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल करने और लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त की और विरोध किया।

उन्होंने भारत के कदम को ”अस्वीकार्य” बताया. जवाब में, भारत ने कहा कि पुनर्गठन पूरी तरह से आंतरिक मामला था।

अक्टूबर 2019 में जब दोनों स्वायत्त क्षेत्र औपचारिक रूप से अस्तित्व में आए, तो एक अन्य चीनी प्रवक्ता गेंग सुवांग ने आपत्ति दोहराई।

प्रवक्ता गेंग सुवांग ने कहा, “जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को तथाकथित केंद्र शासित प्रदेश बनाने के भारत के कदम ने चीनी क्षेत्र के कुछ हिस्सों को भारतीय प्रशासन के अधीन कर दिया है।”

यह कदम अवैध, अशक्त और शून्य है और वास्तविकता को नहीं बदल सकता।

उस समय भारतीय विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता ने कड़ा जवाब दिया था कि चूंकि भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता है, इसलिए चीन सहित अन्य देशों से भारत के आंतरिक निर्णयों पर टिप्पणी की अपेक्षा नहीं की जाती है।

इतना ही नहीं, पाकिस्तान के अनुरोध पर चीन ने 2019 में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बंद कमरे में हुई बैठक में भी यह मुद्दा उठाया था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अन्य स्थायी सदस्यों, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस ने चीनी प्रस्ताव में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. चीन को वहां से कोई समर्थन नहीं मिल सका।

बाद में, दिसंबर 2023 में, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का सरकार का निर्णय संवैधानिक रूप से उचित था, तो चीन ने फिर से विरोध किया।

13 दिसंबर 2023 को प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि अदालत के फैसले से यह तथ्य नहीं बदलेगा कि सीमा का पश्चिमी हिस्सा हमेशा चीन का रहा है और चीन कभी भी लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में मान्यता नहीं देगा।

2020 सैन्य मुठभेड़ और कूटनीतिक उतार-चढ़ाव

भारत और चीन के बीच ये सीमा विवाद सिर्फ कागजों और नक्शों तक ही सीमित नहीं है. यहां तक ​​कि इसने दोनों देशों को युद्ध के कगार पर भी पहुंचा दिया है।

15 जून 2020 से पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी समेत इलाकों में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई।

झड़प में दोनों पक्षों के सैनिक मारे गए, जिसके कारण दोनों देशों के बीच राजनीतिक और राजनयिक संबंध इतिहास में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए।

पूर्वी लद्दाख सीमा पर लंबे समय तक चले सैन्य तनाव के बाद दोनों देशों ने सैन्य और राजनयिक स्तर पर दर्जनों बार बातचीत की।

भारत और चीन आखिरकार अक्टूबर 2024 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर विवादित बिंदुओं से सैनिकों को हटाने के लिए एक समझौते पर पहुंचे।

इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों के सामान्य होने का रास्ता खुल गया।

संबंधों को बेहतर बनाने के लिए दोनों देशों ने विश्वास बढ़ाने के लिए कई उपाय अपनाने शुरू कर दिए. वहीं, दोनों देशों के बीच बंद पड़ी सीधी हवाई सेवाओं को दोबारा संचालित करने पर भी सहमति बनी।

भारत ने चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा जारी करने की प्रक्रिया फिर से शुरू कर दी है।

हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थल कैलाश मानसरोवर यात्रा को भी फिर से शुरू किया गया।

कूटनीतिक प्रयास

शीर्ष स्तर से दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों के प्रमुखों ने उच्च स्तरीय बैठकें की हैं।

भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस के कज़ान में 2024 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता की।

उस बैठक में दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी सरकारों को सीमा पर शांति कायम कर द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था।

इसके बाद राजनयिक आदान-प्रदान में तेजी आई। 2025 में, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीनी शहर तियानजिन का दौरा किया।

इसी तरह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी हाल ही में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत की राजधानी नई दिल्ली आये थे।

सात साल के लंबे अंतराल के बाद राष्ट्रपति शी की यह पहली भारत यात्रा थी।

शिखर सम्मेलन के दौरान, प्रधान मंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी दोनों ने अपनी पिछली बैठक के बाद से द्विपक्षीय संबंधों में लगातार प्रगति को स्वीकार किया।

उस अवसर पर, भारतीय प्रधान मंत्री मोदी ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि सीमा क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के बीच संबंधों के आगे विकास के लिए एक आवश्यक शर्त है।

अजीत डोभाल और वांग यी ने सीमा विवाद का समाधान खोजने के लिए 19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता की, जिसमें उचित क्षेत्रों में सीमांकन की ‘शुरुआती फसल’ का पता लगाने और भारत-चीन सीमा मामलों के परामर्श और समन्वय तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) के तहत एक विशेषज्ञ समूह बनाने पर सहमति हुई।

इसके बाद 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में 25वें दौर की वार्ता हुई, जहां सीमांकन और सीमा प्रबंधन के लिए ‘प्रारंभिक और पर्याप्त फसल’ की दिशा में प्रगति के लिए आठ बिंदुओं पर सहमति हुई।

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