भारत के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला: धर्मांतरण के बाद जातिगत आरक्षण नहीं

 

उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट

काठमाण्डौ,नेपाल – भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि यदि आप अपना धर्म बदलते हैं, तो आप जाति की पहचान के आधार पर आरक्षण सुविधाओं का दावा नहीं कर सकते।

कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति यदि दूसरा धर्म अपनाता है तो उसे अपनी पिछली सामाजिक स्थिति के आधार पर जातिगत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में इस्लाम अपनाने वालों को आरक्षण की सुविधा देने से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

मद्रास उच्च न्यायालय ने इस्लाम अपनाने वाले लोगों को आरक्षण देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के प्रावधानों और जातिगत आरक्षण के सिद्धांत के आधार पर इस मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया।

कोर्ट के मुताबिक, हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाति के आधार पर मौजूद सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति दूसरे धर्म को अपनाने के बाद अपने आप खत्म नहीं हो जाती है।

इसलिए, पहले से पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद उसी आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकता है।

इस निर्णय ने भारत में धार्मिक रूपांतरण और जाति आरक्षण के बीच संबंधों पर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण प्रदान किया।

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