धनतेरस से जुड़ी है राजा हेम के पुत्र की अद्भुत पौराणिक कथा, सोने-चांदी की चमक और दीपों के प्रकाश के आगे टल गई थी अकाल मृत्यु, तभी से शुरू हुई यम दीपदान की परंपरा

महराजगंज,जनपद मे धनतेरस दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व में धनतेरस का विशेष धार्मिक महत्व है। इस पर्व से जुड़ी एक ऐसी पौराणिक कथा प्रचलित है, जो पत्नी के प्रेम, बुद्धिमत्ता और दीपों की महिमा को दर्शाती है। मान्यता है कि एक धर्मपरायण पत्नी ने अपनी सूझबूझ से यमराज को भी पति के प्राण लेने से रोक दिया था। इसी घटना को धनतेरस की शाम यम दीपदान की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हेम के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। राजकुमार की कुंडली देखने के बाद ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के ठीक चौथे दिन सर्पदंश के कारण उसकी अकाल मृत्यु हो जाएगी। इस भविष्यवाणी से राजा चिंतित रहने लगे और उन्होंने राजकुमार की सुरक्षा के लिए विशेष सावधानी बरती।
समय आने पर राजकुमार का विवाह एक सुंदर, बुद्धिमान और धर्मपरायण कन्या से हुआ। जब नवविवाहिता को पति की मृत्यु से जुड़ी भविष्यवाणी के बारे में पता चला तो उसने हार मानने के बजाय अपने पति के प्राण बचाने की ठान ली।
विवाह के चौथे दिन उसने एक अनोखी योजना बनाई। उसने कमरे के दरवाजे पर सोने-चांदी के आभूषणों और सिक्कों का ढेर लगा दिया। पूरे महल और कमरे को दीपों की रोशनी से जगमगा दिया। इसके बाद वह पूरी रात जागकर पति को कहानियां और मधुर गीत सुनाती रही, ताकि पति को नींद न आए।
कथा के अनुसार, निर्धारित समय पर मृत्यु के देवता यमराज सर्प का रूप धारण कर राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे। लेकिन कमरे के बाहर फैली दीपों की तेज रोशनी और सोने-चांदी की चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं। यमराज कमरे के भीतर प्रवेश नहीं कर सके। वे आभूषणों के ढेर पर बैठकर राजकुमारी की कहानियां और गीत सुनने लगे। देखते ही देखते रात बीत गई और सुबह होने पर यमराज बिना राजकुमार के प्राण लिए वापस लौट गए।
इस प्रकार पत्नी की बुद्धिमत्ता और सतर्कता से राजकुमार की जान बच गई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी घटना की स्मृति में धनतेरस की संध्या पर यमराज के नाम से दीपदान करने की परंपरा प्रचलित हुई।
अकाल मृत्यु से बचाव की कामना का प्रतीक है यम दीपदान
धनतेरस की शाम घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर यमराज के निमित्त दीप जलाया जाता है। धार्मिक विश्वास है कि श्रद्धा और विधि-विधान से यम दीपदान करने से परिवार पर अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और घर में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहती है। धनतेरस पर धातुओं की खरीदारी और दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा भी इसी शुभता और मंगलकामना से जुड़ी मानी जाती है।
यह कथा संदेश देती है कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य, बुद्धिमत्ता और सकारात्मक सोच से संकट का सामना करना चाहिए। धनतेरस का दीप केवल घर को रोशन नहीं करता, बल्कि जीवन में स्वास्थ्य, सुरक्षा, सुख-समृद्धि और मंगल की कामना का प्रतीक भी है।

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