लिपुलेख पर भारत से बातचीत में डरने की जरूरत नहीं’, नेपाली विशेषज्ञ की बालेन शाह को सलाह, चुप है चीन

उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
14/05/2026

काठमाण्डौ,नेपाल – बलेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद लिपुलेख को लेकर नेपाल का भारत के साथ एक बार फिर विवाद शुरू हो गया है।

लिपुलेख के रास्ते मानसरोवर यात्रा और चीन के साथ व्यापार को लेकर नेपाल में गुस्सा है।

नई दिल्ली ने नेपाल सरकार की ओर से भेजी गई आपत्ति को खारिज कर दिया है।
जबकि चीन ने चुप्पी साध रखी है।

नेपाल में भारत के प्रति नाराजगी है और विशेषज्ञ लेख लिख रहे हैं।

नेपाल के विदेश मंत्रालय में प्रोटोकॉल के पूर्व प्रमुख गोपाल बहादुर थापा ने काठमाण्डौ पोस्ट में लिखे एक लेख में कहा कि ‘लिपुलेख पर नेपाल का अधिकार है और नक्शे से लेकर दस्तावेजों तक वह उसके पक्ष में है।

जिसे नेपाल सरकार को भारत के सामने पेश करना चाहिए।’

उनका तर्क है कि 1815 से आज तक काली या महाकाली नदी नेपाल की पश्चिमी सीमा पर लिम्पियाधुरा में अपने पारंपरिक स्रोत से भारत की ओर बहती है।

ऊपरी इलाकों में ब्रिटिश और नेपाली अभिलेखों में इसे अक्सर ‘काली नदी’ के रूप में जाना जाता है।

फिर 1850 के दशक के अंत से भारत के सर्वेयर जनरल (अंग्रेजों के समय) द्वारा बनाए गए नक्शों में इसका नाम अचानक गायब हो जाता है।

इसे ‘कुटी’, ‘कुटियांगती’ या ‘कुटियंती’ नामों से प्रतिस्थापित किया जाता है।

आश्चर्य की बात है कि 1856 के मानचित्र में लिपुलेख से कुछ किलोमीटर पूर्व में बहने वाली एक अनाम धारा को उसका वास्तविक नाम ‘काली’ दिया गया है।

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