भारत द्वारा ‘तिस्ता समझौते’ को सालों तक रोकने के बाद बांग्लादेश ने उठाया कदम: चीन के साथ मिलकर प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया, भारत के लिए टेंशन!

 

उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
09/05/2026

काठमाण्डौ,नेपाल – दक्षिण एशियाई राजनीति में टीस्टा नदी के पानी का वितरण हमेशा एक संवेदनशील मुद्दा रहा है।

बांग्लादेश की तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार ने औपचारिक रूप से टीस्टा नदी पुनरुद्धार परियोजना के लिए चीन का समर्थन मांगा है, जिससे क्षेत्र की कूटनीति में एक नई बहस छिड़ गई है।

‘तिस्ता नदी प्रबंधन परियोजना’ (TRCMRP) क्या है?

बांग्लादेश द्वारा शुरू की गई टीस्टा नदी व्यापक प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना (टीआरसीएमआरपी) लगभग 1 बिलियन डॉलर की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है।

इस परियोजना के मुख्य उद्देश्य हैं:

नदी की गहराई बढ़ाना:

मानसून के दौरान बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए नदी तल की खुदाई करना।

सिंचाई सुदृढ़ीकरण:

सर्दियों में पानी की कमी को कम करने के लिए विशाल जलाशयों और नहरों का निर्माण।

तटबंधों का निर्माण:

नदी के कटाव को रोकने और कृषि योग्य भूमि की रक्षा के लिए आधुनिक तटबंधों का निर्माण।

आर्थिक क्षेत्र का विकास:

नदी के किनारे कारखानों एवं बस्तियों का विकास।


टीस्टा नदी भारत में सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है।

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार एक निचले तटीय देश के रूप में, बांग्लादेश पानी पर अपना अधिकार मांग रहा है।

हालाँकि, 2011 में भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाला ‘टीस्टा समझौता’ पश्चिम बंगाल की निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के रुख के कारण दशकों से रुका हुआ है।

जहां भारत टीस्टा में अपने नियंत्रण और सुरक्षा हितों का दावा करता है, वहीं बांग्लादेश चीनी प्रौद्योगिकी और ऋण सहायता को दिल्ली के लिए एक रणनीतिक चुनौती के रूप में देखता है।

विशेषकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के पास चीनी उपस्थिति भारत के लिए एक सुरक्षा चिंता का विषय है।

सुत्रो के अनुसार बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने टीस्टा परियोजना को गति देने के लिए बीजिंग में मुलाकात की। बांग्लादेश इसे अपनी ‘जल सुरक्षा’ और ‘खाद्य सुरक्षा’ से जोड़ता है।

भले ही नेपाल सीधे तौर पर तीस्ता नदी के प्रवाह क्षेत्र में नहीं है, लेकिन नदी के पानी को लेकर पड़ोसी देशों के बीच विवाद और विदेशी शक्तियों के प्रवेश का प्रभाव समग्र दक्षिण एशियाई जल-राजनीति पर पड़ता है।

बांग्लादेश के इस ‘साहसिक कदम’ को इस संदर्भ में सार्थक रूप से देखा जाता है कि नेपाल भी गंडक, कोशी और महाकाली जैसी नदियों पर भारत के साथ ऐसी ही जटिल समस्याओं का सामना कर रहा है।

भारत के साथ दशकों की बातचीत के ठोस नतीजे नहीं निकलने के बाद बांग्लादेश का चीन के पास पहुंचना ढाका की विदेश नीति में बदलाव का संकेत देता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चीन तीस्ता परियोजना पर काम शुरू करता है, तो इससे दक्षिण एशिया में भारत के पारंपरिक प्रभाव को धक्का लग सकता है।

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