उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
18/04/2026
काठमाण्डौ,नेपाल – कुछ दिन पहले पाकिस्तान के लड़ाकू विमान और सैन्य बल सऊदी अरब पहुंचे थे।
इस तैनाती को पिछले साल दोनों देशों के बीच हुए रक्षा समझौते का हिस्सा माना जा रहा है।
इस समझौते के तहत दोनों देशों में से किसी एक पर हमला दूसरे देश पर हमला माना जाएगा और दूसरा देश हमला करने वाले देश की सैन्य सहायता करेगा।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब पाकिस्तान ईरान-अमेरिका वार्ता में मध्यस्थता कर रहा है. इस वार्ता का उद्देश्य ईरान युद्ध को समाप्त करने का रास्ता खोजना है।
हालांकि, पहले चरण की बातचीत में कोई समाधान नहीं निकला है. आने वाले दिनों में दूसरे दौर की बातचीत होने की खबर सार्वजनिक कर दी गई है।
सऊदी रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तानी सेना की तैनाती क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ संयुक्त रक्षा सहयोग को मजबूत करने के तहत की गई है।
वहीं, सुत्र से बात करते हुए एक पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि सऊदी अरब में आए पाकिस्तानी सैनिक ‘किसी पर हमला करने’ के लिए नहीं आए है।
इस कदम ने इसके समय और इसके रणनीतिक निहितार्थों के बारे में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा गारंटी के भविष्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह सवाल भी चर्चा का विषय बन गया है।
इन देशों के बाद जैसे ही ईरान ने खाड़ी क्षेत्रों पर हमला किया है, अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर सवाल खड़ा हो गया है।
इसके अलावा, चीन द्वारा समर्थित पाकिस्तान की सैन्य तकनीक और अमेरिकी रक्षा प्रणालियों के बीच समन्वय भी एक बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान दोनों का दोस्त बताता रहा है।
ऐसे में ईरानी हमले के बाद सऊदी अरब में अपनी सेना भेजना पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका पर भी सवाल उठाता है।
पर्यवेक्षकों का मानना है कि करीब एक साल पहले पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करके सऊदी अरब ने अपने लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा क्षेत्र बनाया है, ताकि अमेरिका पर उसकी निर्भरता कम हो जाए।
*क्या अमेरिका पर विश्वास कम हो गया है?*
खाड़ी देशों में व्यापक नाराजगी है कि ईरान के साथ युद्ध के अमेरिकी फैसले में उनके हितों और संभावित नुकसान पर विचार नहीं किया गया।
ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने खाड़ी देश में महत्वपूर्ण तेल क्षेत्रों और नागरिक सुविधाओं पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले शुरू किए हैं।
इसलिए उन देशों में गुस्सा बढ़ गया है और कहा जा रहा है कि उन्हें अमेरिका द्वारा थोपे गए इस युद्ध की कीमत चुकानी पड़ेगी।
सऊदी सुरक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञ हसन अल-शहरी के अनुसार, दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते के तहत सऊदी धरती पर पाकिस्तान वायु सेना की तैनाती से पता चलता है कि सऊदी अरब अपनी सुरक्षा गारंटी में विविधता लाना चाहता है।
उन्होंने इसे एक स्मार्ट कदम बताया, जिसका मतलब है एक तरफ अमेरिका के साथ साझेदारी बनाए रखना और दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ एक अलग समानांतर सुरक्षा कवच बनाना।
सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते (एसएमडीए) में प्रावधान है कि एक तरफ का हमला दोनों तरफ का हमला माना जाएगा।
हाल के दिनों में खाड़ी देशों में अमेरिकी सुरक्षा को लेकर भरोसा कम हुआ है. ताजा घटनाक्रम को भी इसी नजर से देखा जाता है।
अल-साहरी ने कहा है कि कैसे पाकिस्तान के साथ यह रणनीतिक रक्षा समझौता सऊदी अरब को और मजबूत करेगा।
उनके मुताबिक सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी के कारण ईरान और उसके सहयोगी देश सऊदी अरब या खाड़ी देशों को निशाना बनाने से पहले पुनर्विचार करेंगे।
*पाकिस्तान क्या संदेश देना चाह रहा है?*
यह रक्षा समझौता अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से कुछ महीने पहले हुआ था। इसलिए, इस तथ्य के बावजूद कि, पाकिस्तानी अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्य किसी पर “हमला” करना नहीं है, पाकिस्तानी सैनिकों का आगमन समझौते की गंभीरता को दर्शाता है।
2015 में यमन युद्ध के दौरान सऊदी अरब ने पाकिस्तान से सैन्य सहायता मांगी थी, लेकिन उस समय पाकिस्तानी संसद ने अनुरोध अस्वीकार कर दिया था।
अल-साहरी के मुताबिक, आज स्थिति अलग है क्योंकि अब दोनों देशों के बीच औपचारिक रक्षा समझौता हो गया है।
रक्षा लेखक और अमेरिकी पत्रकार सेबेस्टियन रॉबलिन ने कहा, “यह याद रखना चाहिए कि यमन युद्ध में ज़मीन पर सऊदी अरब का हस्तक्षेप आक्रामक प्रकृति का था, जबकि मौजूदा संघर्ष में सऊदी अरब की स्थिति अब तक रक्षात्मक रही है।”
अरब-यूरेशियन अध्ययन केंद्र की दक्षिण एशिया अध्ययन इकाई के निदेशक डॉ. मुस्तफा शलाश कहते हैं, ‘सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना की तैनाती अधिक प्रतीकात्मक है।
यह पाकिस्तान की रक्षा प्रतिबद्धता और अपने सहयोगियों के प्रति वफादारी का संदेश है।’
उनके मुताबिक युद्ध शुरू होने के एक महीने बाद सऊदी अरब में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर जो सवाल उठे थे, ये तैनाती उन सवालों का जवाब भी है।
गौरतलब है कि सऊदी अरब के साथ समझौते के बावजूद सवाल उठ रहे थे कि पाकिस्तान ईरानी हमलों से बचने के लिए सऊदी अरब की मदद क्यों नहीं कर रहा है।
*क्या सऊदी अमेरिका को दे रहा है संदेश?*
सुत्र से बात करते हुए डॉ. शलाश ने कहा कि पाकिस्तान एक बड़ी सैन्य और परमाणु शक्ति होने के बावजूद आर्थिक रूप से कमज़ोर है।
उन्होंने इस मुद्दे को मीडिया में आई हालिया रिपोर्टों से भी जोड़ा, जिसमें पाकिस्तान के लिए संभावित 5 बिलियन डॉलर के सऊदी-कतरी आर्थिक पैकेज पर चर्चा की गई थी, हालांकि इसकी अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
इस बीच गुरुवार को स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने एक्स पर एक पोस्ट कर जानकारी दी कि 15 अप्रैल को उसे सऊदी अरब के वित्त मंत्रालय से दो अरब अमेरिकी डॉलर का फंड मिला है।
दूसरी ओर, सेबेस्टियन रोबलिन का मानना है कि सऊदी अरब अमेरिका के साथ अपने “अस्थिर” संबंधों के बीच अन्य साझेदारियां विकसित कर रहा है।
उनके मुताबिक, इसका मकसद अमेरिका को एक संदेश भेजना हो सकता है, ताकि अमेरिका अपनी साझेदारी को बनाए रखने में अधिक सतर्क रहे।
इस प्रकार, पाकिस्तान की सैन्य उपस्थिति सऊदी अरब की अन्य सहयोगियों को अपने साथ लाने की क्षमता को दर्शाती है।
हालाँकि, रोबलिन के विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तानी उपस्थिति ईरानी दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, ”अगर ईरानी ड्रोन हमले में कोई पाकिस्तानी सैनिक मारा जाता है तो इससे ईरान और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने का ख़तरा हो सकता है.” क्योंकि पाकिस्तान की सीधी सीमा ईरान से लगती है।
*चुनौतियां दोनों के सामने हैं*
सऊदी अरब की रक्षा प्रणाली मुख्य रूप से अमेरिकी THAAD और पैट्रियट सिस्टम पर निर्भर करती है।
हालाँकि, वह दक्षिण कोरिया, रूस, चीन, तुर्की और यूक्रेन की कुछ अन्य प्रणालियों का भी उपयोग करता है।
इसी तरह, पाकिस्तान अपनी लगभग 80 प्रतिशत सैन्य क्षमताओं जैसे विमान, टैंक और मिसाइलों के लिए चीन पर निर्भर है। बाकी 20 फीसदी में अमेरिका और फ्रांस की तकनीक शामिल है।
हसन अल-शहरी के मुताबिक, सऊदी अरब में पाकिस्तान की चीनी तकनीक और अमेरिकी तकनीक के बीच टकराव की संभावना है, लेकिन बेहतरीन समन्वय के जरिए दोनों पक्षों (पाकिस्तान और सऊदी अरब) को इससे फायदा हो सकता है।
डॉ. शलाश के मुताबिक, यह कोई बड़ी समस्या नहीं होगी। क्योंकि, पाकिस्तान के पास अमेरिकी तकनीकों के साथ काम करने का अनुभव भी है।
दूसरी ओर, रॉबलिन के मुताबिक, सऊदी अरब पहले से ही कुछ चीनी हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है, जिनमें विंग लंग ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं।
हालांकि, उनका मानना है कि सऊदी वायु रक्षा प्रणाली से मुकाबला करना पाकिस्तान के जेएफ-17 लड़ाकू विमानों के लिए एक चुनौती होगी।
उनके अनुसार, अमेरिकी हथियार प्रणाली के भीतर भी “मैत्रीपूर्ण गोलीबारी” का जोखिम और समन्वय की आवश्यकता बनी हुई है।
इसलिए सऊदी अरब को अपने हथियारों, राडार और पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों का समन्वय बहुत सावधानी से करना होगा।
कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाया है कि पाकिस्तान सऊदी अरब में अपनी सैन्य उपस्थिति और अमेरिका-ईरान युद्धविराम वार्ता में मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका के बीच संतुलन कैसे बनाए रखेगा।
डॉ. शलाश के मुताबिक, इस युद्ध में ईरान द्वारा उन्हें निशाना बनाए जाने के बाद कतर और ओमान जैसे पारंपरिक मध्यस्थ देशों के लिए मध्यस्थता जारी रखना तर्कसंगत नहीं है।
ऐसे में पाकिस्तान ईरान के लिए एक स्वीकार्य विकल्प बनकर उभरा है।
उनके मुताबिक पाकिस्तान के पक्ष में कई सकारात्मक बातें हैं।
इनमें ईरान के साथ साझा रणनीतिक हित, इज़राइल के साथ कोई संबंध नहीं, चीन के साथ दोनों देशों के घनिष्ठ संबंध और पाकिस्तान के भीतर एक बड़े शिया समुदाय की उपस्थिति शामिल है।
इसी आधार पर शालाश ने पाकिस्तान की भूमिका को ‘सक्रिय तटस्थता’ कहा।
उनके मुताबिक, जब तक सऊदी अरब ईरान पर हमला करने या सीधी जवाबी कार्रवाई करने का फैसला नहीं करता, तब तक सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना की भूमिका आक्रामक नहीं, बल्कि रक्षात्मक मानी जाएगी।

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