कानून का राज या वर्दी का भय?

 

पुलिस का दायित्व अपराध की विवेचना करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि स्वयं दंड देने का – विनय तिवारी जर्नलिस्ट

 

पिपराइच/गोरखपुर (विनय तिवारी की कलम से)। पिपराइच में एक युवक के साथ कथित पुलिस बर्बरता का मामला केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसका मूल उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा और कानून का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना है। यदि किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप है, तो उसकी जांच, गिरफ्तारी और सजा का अधिकार केवल कानून और न्यायालय को है। पुलिस का दायित्व अपराध की विवेचना करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि स्वयं दंड देने का।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं, लेकिन इन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी जुड़ी है। यदि कोई पुलिसकर्मी अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है और कानून से ऊपर खुद को समझने लगता है, तो इससे पूरे पुलिस तंत्र की साख प्रभावित होती है। कुछ लोगों की गलत हरकतों का दाग पूरी वर्दी पर लग जाता है।
हर बार किसी विवादित घटना के बाद संबंधित पुलिसकर्मियों को निलंबित कर देना एक प्रशासनिक कदम हो सकता है, लेकिन यदि जांच में अत्यधिक बल प्रयोग, हिरासत में मारपीट या मानवाधिकारों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो केवल निलंबन पर्याप्त नहीं होना चाहिए। कानून सभी के लिए समान है। जिस प्रकार आम नागरिक कानून तोड़ने पर मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया का सामना करता है, उसी प्रकार दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी विधि के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच हो। आरोपों की सत्यता की पुष्टि स्वतंत्र और पारदर्शी जांच से ही हो सकती है। यदि पुलिस निर्दोष है तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए, और यदि दोषी है तो पीड़ित को भी न्याय मिलना चाहिए। न्याय का अर्थ केवल दंड नहीं, बल्कि निष्पक्षता भी है।
पुलिस और जनता के बीच विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है। जब नागरिक पुलिस से सुरक्षा की अपेक्षा करने के बजाय भय महसूस करने लगें, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है। ऐसे मामलों में त्वरित, निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई ही जनता का भरोसा बनाए रख सकती है।
पिपराइच की घटना की सच्चाई जांच से सामने आएगी, लेकिन यह मामला एक बड़ा संदेश देता है—कानून का शासन तभी मजबूत होगा, जब वर्दी भी कानून के दायरे में रहे। लोकतंत्र में न अपराधी को कानून से ऊपर होने का अधिकार है और न ही कानून लागू करने वाली किसी संस्था को।

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