कहाँ गईं वो चवन्नी और अठन्नी? क्या बच्चों के साथ गुम हो गईं 25 और 50 पैसे की मासूम खुशियाँ

विनय तिवारी की कलम से

एक दौर था जब जेब में खनकती चवन्नी (25 पैसे) और अठन्नी (50 पैसे) बच्चों के चेहरे पर मुस्कान बिखेर देती थीं। आज न तो वे सिक्के बाजार में दिखाई देते हैं और न ही बच्चों की जेबों में उनकी खनक सुनाई देती है। सवाल सिर्फ इन सिक्कों के गायब होने का नहीं, बल्कि उस बचपन के बदल जाने का है, जो छोटी-छोटी चीजों में बड़ी खुशियाँ ढूंढ़ लेता था।
कभी स्कूल जाते समय माता-पिता बच्चों की हथेली पर चवन्नी या अठन्नी रख देते थे। रास्ते में टॉफी, लेमनचूस, इमली, बिस्कुट, मूंगफली या बर्फ का गोला खरीदना किसी उत्सव से कम नहीं होता था। इन सिक्कों की कीमत रुपये से कहीं अधिक थी, क्योंकि इनमें बचपन की मुस्कान, अपनापन और संतोष छिपा होता था।
समय बदला, महंगाई बढ़ी और बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। जिन चीजों की कीमत कभी 25 या 50 पैसे होती थी, वे आज कई गुना महंगी हो चुकी हैं। डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन लेन-देन ने नकदी की जगह मोबाइल को दे दी। नई पीढ़ी शायद यह भी नहीं जानती कि चवन्नी और अठन्नी कैसी दिखती थीं और उनका महत्व क्या था।
यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है। आज बच्चों के हाथों में सिक्कों की जगह मोबाइल फोन हैं, खेल के मैदानों की जगह वीडियो गेम हैं और छोटी-छोटी खुशियों की जगह महंगे गैजेट्स ने ले ली है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन मासूमियत कहीं पीछे छूटती नजर आती है।
चवन्नी और अठन्नी का चलन समाप्त होना समय की मांग हो सकती है, लेकिन इनके साथ जुड़ी यादें कभी समाप्त नहीं होंगी। वे सिक्के भारतीय समाज के उस दौर के प्रतीक थे, जब कम साधनों में भी जीवन संतोष और खुशियों से भरा होता था।
आज जरूरत केवल पुराने सिक्कों को याद करने की नहीं, बल्कि उस सोच को बचाने की है जिसमें छोटी-सी चीज भी बड़ी खुशी दे जाती थी। यदि आने वाली पीढ़ी को बचपन की असली मिठास से परिचित कराना है, तो हमें उन्हें केवल डिजिटल दुनिया नहीं, बल्कि सादगी, अपनापन और छोटी खुशियों का महत्व भी सिखाना होगा। क्योंकि चवन्नी और अठन्नी भले ही बाजार से गायब हो गई हों, लेकिन उनकी खनक भारतीय स्मृतियों में आज भी जीवित है।

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